रात हो गयी- A Tribute To Nida Fazli

बात दो साल पहले की है। बरसात का मौसम था और कोलकाता बरसात में और भी थका हुआ, रुका हुआ सा लगता है। कोलकाता मेरे लिए शहर नहीं है। मुझे तो वो एक अकेला बूढ़ा इंसान जान पड़ता है, जिसके पास कई किस्से हैं अपनी जवानी के सुनाने को मगर कोई मिलता नहीं। सब इसी बूढ़े की तरह अपने बुढ़ापे का इंतज़ार करते दिखाई पड़ते हैं। थोड़ी सी जवानी रात को पार्क स्ट्रीट के डिस्को और पबों में ही दिखाई देती है। उसी बरसात में मैं इस थोड़ी सी जवानी का मज़ा लेते हुए चला जा रहा था। सच बताऊँ तो मैं बहुत दुखी और अकेला था। और इस भीड़ में खोने की कोशिश कर रहा था। मगर भीड़ ने भी मुझे अपनाने से इंकार कर दिया। मैं वापस चला अपने होटल की ओर। पार्क स्ट्रीट से सडर स्ट्रीट पैदल का रास्ता ही था। मैं अपने कमरे में चला आया। सस्ते होटल के कमरों में एक खास बात होती है टीवी का रिमोट या तो होता नहीं या खराब होता है। ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ। किसी चैनल पर मिथून चक्रवर्ती की कोई फिल्म आ रही थी। फिल्म अजीब सी थी मगर अच्छी बात ये थी की मैंने देखी नहीं थी। मैं अपने अकेलेपन का इंतेज़ाम बाहर से ही कर आया था। रॉयल स्तग की बॉटल और एक गोल्डफ्लेक का डब्बा, अपने पुराने साथी। ये फिल्म थी गौतम घोस की गुड़िया। पीते पीते फिल्म देखते मैं समझ नहीं प रहा था की ये पीने का असर है या फिल्म इतनी अजीब है। अजीब सी मनहूसियत थी उसके हर एक सीन में। मैं दुखी भी था। दुख की वजह बताना जरूरी नहीं क्योंकि वजह हमेशा ही सबजेकटिव होता है। बात इतनी है की मैं बहुत दुखी था। अचानक फिल्म में एक गाना शुरू हुआ।

हम तुम हुए जैसे जुदा, हम तुम हुए जैसे जुदा

हो न कोई, अल्लाह करे, कोई ऐसे जुदा

आगे की लाइने थी…..

यार बिना ये जग सारा कंकर पत्थर है

दिल ही मंदिर मस्जिद भी दिल ही दिलबर है

जैसे फूल चमन से जान बदन से हाये हुई है जुदा

हम तुम हुए ऐसे जुदा……..

मुझे पता है ये लाइंस कोई खुद में जादू नहीं हैं।

मगर ये गाना सुनिएगा जरूर
उस फिल्म की मनहूसियत को ये चार चंद लगा रही थी और मेरे तत्कालीन हालत को भी।

मैंने शायद बिना खुद को नोटिस दिये रोना शुरू कर दिया।

जब मैं संभला तो जानना चाहा की ये गाना लिखा किसने है।

गूगल ने मेरी मदद की और निदा  फ़ाजली साहब का नाम आया।

मैं उनको जानता था बहुत पहले से। उन्होने कई हिट गाने लिखे हैं जैसे “होश वालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज़ है” या “तू इस तरह से मेरी ज़िंदगी में शामिल है” “कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता” और भी कई।

मगर उस रात गुड़िया के इस गीत ने हम दोनों को अंजान बना दिया। पीकर रोते रोते मुझे लगा किसी ने मेरा हाथ पकड़ा है। सर उठाया तो फ़ाजली साहब बैठे थे बगल में और कह रहे थे

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपनी सफर के हम हैं

रुख हवाओं का का जिधर का है उधर के हम हैं

मैंने नशे में ही पूछा, “हम तो अकेले थे आप कहाँ से आ गए?

उन्होने हँसते हुए कहा,

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें

किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये।

मैं भी समझ गया की अब ये सुबह होने या मेरे बेहोश होने तक जानेवाले नहीं, तो हमने एक पेग उनके लिए भी बनाया, पूछा पानी के साथ लेंगे तो कहते हैं,

ज़रूरी क्या की हर एक महफिल में बैठें

तकल्लुफ़ की रवादरी से बचिए

अगर आप पिएंगे नहीं तो हमारे गम को क्या समझेंगे? मैंने गुस्से में कहाnida

ये सुनकर वो उठ खड़े हुए और कहे,

अब खुशी है न कोई दर्द रुलाने वाला

हमने अपना लिया है हर रंग जमाने वाला

उनकी अंदाज़ से अब मैं तंग आ रहा था। फिर मैंने सोचा अकेले बैठ के रोने से अच्छा है की समझदार आदमी सामने है, क्यों न अपनी तकलीफ बता कर इनसे उपाय पूछ लिया जाये। शायद मदद कर दें।

अभी मेरा सोचना खतम भी नहीं हुआ था और मुस्कुरा कर वो बोल पड़े,

बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता

जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नहीं जाता

मेरे मूंह से अपने आप निकला, “हाँ येही तो, येही तो प्रोब्लेम है। कब खतम होगा ये सब आप ही बताइये?

वो मुसकुराते रहे और कहते रहे,

दुनिया जिसे कहते हैं मिट्टी का खिलौना है

मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये तो सोना है

मैंने अब अपना सर पकड़ लिया व्हिस्की की बॉटल भी खाली हो चुकी थी। थोड़ी देर की खामोशी के बाद मैं बोला, “जब आप सब जानते हैं तो मेरी प्रॉब्लेम्स क्यों गिना रहे हैं? कुछ सोल्यूशंस बताइये। माना की हमने गलतियाँ की। बहुत सारी गलतियाँ।

फिर एक बार उन्होने मेरा हाथ पकड़ा और इस बार बिना मुस्कुराए गंभीर होकर कहा,

बहुत मुश्किल है बंजारा-मज़ाज़ी

सलीक़ा चाहिए आवारगी में

मुझे लगा वो मेरा मज़ाक बना रहे हैं क्योंकि शायद ये दो लाइनें मेरी ज़िंदगी का हिसाब दे रही थी। बस दो लाइन और जो जो भी मैंने किया वो सब पलट कर मुझपर हंस रहे थे। मैं चिल्लाया, “अगर आप मेरी मदद नहीं कर सकते तो चले जाइए यहाँ से। अब तो दारू के ठेके भी बंद हो गए होंगे। आपने पूरा नशा उतार दिया।“

फ़ाजली साहब खाली ग्लास उठा कर मेरे सामने की कुर्सी पर बैठ गए। ग्लास को देखते हुए कहा,

दुनिया न जीत पाओ तो हारो ना आप को

थोड़ी बहुत तो ज़ेहन में नाराज़गी रहे

अब वो मुस्कुरा नहीं रहे थे गंभीरता से खाली ग्लास को ही देख रहे थे। मैंने सही मौका समझ कर उनसे पूछ दिया, “अब आप भी मेरा मज़ाक बनाएँगे? आप यहाँ मुझपर हंसने तो आए नहीं होंगे प्लीज कोई रास्ता बताइये। इस ग़म को लेकर हम कहाँ कहाँ भटकें?

फ़ाजली साहब का दो टूक जवाब,

ग़म है आवारा, अकेले में भटक जाता है

जिस जगह रहिए मिलते मिलते रहिए।

वो चुप नहीं हुए अभी, मेरे चेहरे की तरफ हाथ उठा कर बोले,

हँसते हुए चेहरों से है बाज़ार की ज़ीनत

रोने को यहाँ वैसे भी फुर्सत नहीं मिलती

मैं अब थोड़े होश में था। कुछ बातें समझ आ रही थीं।

फ़ाजली साहब अब जाने के मूड में लग रहे थे मेरी परेशानी कम होता देख कर।

बस उन्हें रोकने के लिए मैंने फिर पूछा, “सर लेकिन मैं ही क्यों चुना गया? मैं ही क्यों अकेला रहूँ? बाकी दुनिया ऐश करे?

खड़े होते हुए उन्होने कहा,

एक महफिल में कई महफ़िलें होती हैं शरीक

जिसको भी पास से देखोगे अकेला होगा

मैं बात समझ गया था अब तक और चेहरे की उदासी भी कम हो चली थी। फ़ाजली साहब दरवाजे तक गए तो मैंने उन्हें एक आखिरी आवाज़ लगाई, “और मेरी ज़िंदगी का क्या ऐसे ही रहेगी। मेरा कभी कुछ नहीं होगा। आप भी जा रहे हैं अब?”

वो रुक गए दरवाजे पर ही। वहीं से उन्होनें कहना शुरू किया,

पहले भी जीते थे मगर, जब से मिली है ज़िंदगी

सीधी नहीं है दूर तक उलझी हुई है ज़िंदगीnidafazli

इक आँख से रोती है ये, इक आँख से हँसती है ये

जैसी दिखाई दे जिसे, उसकी वही है ज़िंदगी

जो पाये वो खोये उसे, जो खोये वो रोये उसे

यूं तो सभी के पास है किसकी हुई है ज़िंदगी

हर रास्ता अंजान सा, हर फासला नादान सा

सदियों पुरानी है मगर हर दिन नयी है ज़िंदगी

अच्छी भली थी दूर से, जब पास आई खो गयी

जिसमें ना आए कुछ नज़र, वो रोशनी है ज़िंदगी

मिट्टी हवा लेकर उडी घूमी फिरी वापस मुड़ी

कब्रों पे शिलालेखों की तरह लिक्खी हुई है ज़िंदगी।

इतना कह कर वो मुड़े और अंधेरे में गायब हो गए।

वैसे ये कहानी बहुत लंबी थी मगर मैंने छोटी कर के बताई आपको आपकी सहूलियत के लिए। उस रात मैं अपने आपे में नहीं था और ये कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी की निदा फ़ाजली साहब ने बचा लिया मुझको।

देखा मैंने आज न्यूज़ में की उनका इन्तेकाल हो गया आज। न्यूज़ वाले बेचारों ने शायद ये नहीं पढ़ा कभी जो निदा फ़ाजली कहते हैं,

हर बेचेहरा सी उम्मीद है चेहरा चेहरा

जिस तरफ देखिये आने को है आनेवाला

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इक मुसाफिर के सफर जैसी है सबकी दुनिया

कोई जल्दी में तो कोई देर में जानेवाला

गए नहीं कहीं फ़ाजली। मेरा विश्वास करिए। यहीं हैं बस थोड़ी धूल झाड़िए मिलेंगे आपको।

कल आए थे शाम फिर मेरे पास वो खाली ग्लास लेकर होटल वाली। शायद गलती से ले गए थे। मुझे लगा वापस करने आए होंगे । मगर ग्लास बढ़ते हुए कहा,

कुछ भी बचा ना कहने को, हर बात हो गयी

आओ कहीं शराब पिएँ रात हो गयी

(यह कहानी पूर्ण रूप से काल्पनिक है)

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